Miracle of astrology

विवाह में देरी के 5 ज्योतिषीय कारण और उपाय — कुण्डली में कहाँ देखें?

सीधा उत्तर पहले: कुण्डली में विवाह में देरी का भेद पाँच स्थानों पर खुलता है — सप्तम भाव, सप्तमेश, शनि का प्रभाव, विवाह-कारक ग्रह और दशा का द्वार। आइये, एक-एक को उसी क्रम से समझते हैं जिस क्रम से मैं स्वयं किसी कुण्डली में देखता हूँ। परन्तु पहले एक बात गाँठ बाँध लीजिये — देरी का अर्थ अस्वीकार नहीं होता। ज्योतिष में विलम्ब और निषेध दो भिन्न बातें हैं, और अधिकांश कुण्डलियों में केवल विलम्ब होता है।

पहला कारण — सप्तम भाव में पाप ग्रह

कुण्डली का सातवाँ घर विवाह और जीवनसाथी का घर है। इसमें शनि, मंगल, राहु अथवा सूर्य जैसे ग्रह बैठे हों तो विवाह की गाड़ी सहज गति से नहीं चलती। परन्तु यहाँ भी सूक्ष्मता समझिये — सप्तम का शनि प्रायः देर कराता है, पर जो सम्बन्ध देर से जुड़ता है उसे स्थिरता भी वही देता है। अर्थात् सप्तम का शनि अभिशाप नहीं, परिपक्व आयु में सुदृढ़ विवाह का संकेत है।

दूसरा कारण — सप्तमेश निर्बल अथवा छिपा हुआ

सातवें भाव का स्वामी यदि छठे, आठवें अथवा बारहवें भाव में चला जाये, अस्त हो जाये अथवा नीच राशि में बैठे, तो विवाह के प्रस्ताव आते तो हैं पर बनते-बनते बिगड़ जाते हैं। यह लक्षण बड़ा स्पष्ट होता है — बात आगे बढ़ती है, चित्र आदान-प्रदान होते हैं, और फिर अकारण मौन पसर जाता है। ऐसे में दोष प्रस्तावों का नहीं, सप्तमेश की स्थिति का होता है।

तीसरा कारण — शनि की दृष्टि

शनि विलम्ब का नैसर्गिक ग्रह है। वह जहाँ देखता है, वहाँ परिपक्वता आने तक प्रतीक्षा कराता है। सप्तम भाव अथवा सप्तमेश पर शनि की दृष्टि हो, अथवा विवाह योग्य आयु में साढ़ेसाती चल रही हो, तो प्रस्ताव आकर टलते रहते हैं। ऐसे जातक को मैं सदा यही कहता हूँ — शनि छीनता नहीं, परखता है। जो विवाह शनि की परीक्षा के बाद होता है, वह टूटता नहीं।

चौथा कारण — कारक ग्रह की निर्बलता

पुरुष की कुण्डली में विवाह का कारक शुक्र है और स्त्री की कुण्डली में गुरु। ये कारक यदि अस्त, नीच अथवा पाप-पीड़ित हों, तो भाव और भावेश ठीक होने पर भी बात अटकती है। इसीलिये केवल सप्तम भाव देखकर घोषणा कर देना अधूरा विश्लेषण है — कारक का बल देखे बिना विवाह का विचार पूरा नहीं होता।

पाँचवाँ कारण — दशा का द्वार न खुलना

यह सबसे गूढ़ और सबसे अनदेखा कारण है। कुण्डली में विवाह का योग उत्तम हो, फिर भी विवाह तभी होता है जब सम्बन्धित ग्रह की दशा-अन्तर्दशा का द्वार खुलता है। खेत कितना भी उपजाऊ हो, फसल अपनी नियत ऋतु में ही आती है। इसीलिये दो जुड़वाँ भाइयों तक के विवाह अलग-अलग आयु में होते हैं। जब तक दशा न खुले, तब तक किया गया परिश्रम बीज की तरह भूमि में प्रतीक्षा करता है, नष्ट नहीं होता।

देरी हो तो क्या करें — निरापद उपाय

गुरुवार का व्रत और विष्णु-लक्ष्मी की आराधना कन्याओं के लिये, और शुक्रवार का संयम तथा स्वच्छ श्वेत वस्त्र पुरुषों के लिये — ये सरल और निरापद साधन हैं। माता-पिता इतना अवश्य करें कि भय और अफवाह से दूर रहें — हर देरी मंगल दोष नहीं होती, और मंगल दोष भी अनेक स्थितियों में स्वयं भंग हो जाता है। रत्न के विषय में सावधान रहिये — बिना पूरी कुण्डली दिखाये कोई रत्न धारण न करें, क्योंकि गलत रत्न लाभ के स्थान पर हानि देता है।

कब कुण्डली दिखानी चाहिये?

यदि आयु अट्ठाईस पार कर चुकी है और प्रस्ताव आकर बार-बार टूट रहे हों, तो अब अनुमान नहीं, विश्लेषण की आवश्यकता है — क्योंकि उपाय तभी फलता है जब कारण सही पकड़ा गया हो। जन्मकुण्डली परामर्श के लिये WhatsApp 94728 89427 पर सन्देश भेजिये अथवा मुखपृष्ठ पर सेवाओं का विवरण देखिये।

— पं. नर्मदेश्वर शास्त्री, प्राच्य विद्या उत्थान न्यास, काशी (वाराणसी)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top