सीधा उत्तर पहले: शनि की साढ़ेसाती जन्म के चन्द्रमा की राशि से बारहवीं राशि, फिर उसी चन्द्र राशि, और फिर उससे दूसरी राशि पर शनि के भ्रमण का कुल साढ़े सात वर्ष का काल है। पहला चरण देह, व्यय और निद्रा को छूता है, दूसरा चरण मन तथा निर्णय-शक्ति को, और तीसरा चरण धन, कुटुम्ब एवं वाणी को। परन्तु जो बात प्रायः नहीं बतायी जाती वह यह है कि इन तीनों में सबसे भारी चरण सबका एक नहीं होता। जिस व्यक्ति की कुण्डली में जो भाव पहले से निर्बल है, शनि ठीक उसी चरण में सबसे अधिक कसता है।
इसी कारण एक ही दिन साढ़ेसाती आरम्भ होने पर भी दो व्यक्तियों का अनुभव कभी एक जैसा नहीं होता। पिछले वर्ष एक ही सप्ताह में दो सज्जन मेरे पास आये। दोनों की चन्द्र राशि एक, साढ़ेसाती का आरम्भ भी एक ही मास से। एक की नौकरी छूट गयी थी और दूसरे को उसी अवधि में पदोन्नति मिली थी। दोनों की कुण्डली सामने रखने पर भेद स्पष्ट हो गया, और वही भेद इस लेख का विषय है।
साढ़ेसाती की गणना चन्द्रमा से क्यों होती है, लग्न से क्यों नहीं?
चन्द्रमा मन का कारक है और शनि देह, कर्म तथा काल का। जब शनि मन की राशि को तीनों ओर से घेरता है तो वह घटना से पहले धारणा बदलता है। इसीलिये साढ़ेसाती का पहला लक्षण बाहर नहीं, भीतर प्रकट होता है। उत्साह का घटना, निर्णय में विलम्ब, भीड़ से दूर रहने की इच्छा, प्रिय वस्तुओं में भी रस न आना। ध्यान दीजिये, अभी तक बाहर कुछ नहीं बिगड़ा, केवल भीतर की गति धीमी हुई है। जिन गृहस्थों का चन्द्रमा जन्मकुण्डली में बलवान है, पूर्ण कलाओं वाला, केन्द्र में स्थित अथवा गुरु की दृष्टि से युक्त, उनको यही साढ़ेसाती धैर्य और गहराई देती है। और जिनका चन्द्रमा क्षीण है, पाप ग्रहों के मध्य दबा है, उनको यही काल भ्रम और भय देता है। शनि अपना फल नहीं बदलता, वह केवल पात्र की सहनशक्ति को उघाड़ देता है।
पहला चरण, जब शनि चन्द्रमा से बारहवें चलता है
यह ढाई वर्ष कटौती का काल है। द्वादश भाव व्यय, शय्या-सुख, एकान्त, चिकित्सालय और परदेश का भाव है, अतः इस चरण में निद्रा टूटती है, अकारण व्यय बढ़ता है, स्थान अथवा कार्यक्षेत्र बदलता है, पैर तथा नेत्र से सम्बन्धित छोटी व्याधियाँ उठती हैं, और ऐसे विरोधी खड़े होते हैं जिनका मुख भी दिखायी नहीं देता। परन्तु इस चरण का वास्तविक प्रयोजन हानि पहुँचाना नहीं, अनावश्यक को छाँटना है। जो गृहस्थ इस ढाई वर्ष में व्यय पर संयम रख लेते हैं और शरीर की उपेक्षा नहीं करते, उनके शेष पाँच वर्ष सरलता से कट जाते हैं। इस चरण की सबसे बड़ी भूल यह है कि लोग ऋण लेकर नया बड़ा दायित्व खड़ा कर लेते हैं और फिर शेष पाँच वर्ष उसी बोझ को ढोते रहते हैं।
दूसरा चरण, जब शनि चन्द्रमा के ऊपर से जाता है
यही वह ढाई वर्ष है जिसका सबसे अधिक भय बेचा जाता है, और यहीं सबसे बड़ी भ्रान्ति भी है। यह चरण घटनाओं का नहीं, मनःस्थिति का है। बाहर से देखने पर सब कुछ यथावत् चलता रहता है, भीतर से थकान बैठ जाती है। घर के कलह प्रायः इसी चरण में इसलिये बढ़ते हैं कि व्यक्ति की सहने की क्षमता घट जाती है, इसलिये नहीं कि परिस्थिति सचमुच बिगड़ गयी है। यही वह अवधि है जिसमें माता के स्वास्थ्य पर विशेष दृष्टि रखनी चाहिये, क्योंकि चन्द्रमा माता का भी कारक है। और यही वह अवधि है जिसमें, यदि जन्मकुण्डली में चन्द्रमा शुभ स्थिति में हो, व्यक्ति के जीवन का सबसे उर्वर परिवर्तन घटता है। इसी चरण में लोग गम्भीर होते हैं, व्यसन छोड़ते हैं, उपासना पकड़ते हैं और वह निर्णय ले पाते हैं जो सुख के दिनों में कभी नहीं ले सके।
तीसरा चरण, जिसमें लोग समय से पूर्व निश्चिन्त हो जाते हैं
अब शनि चन्द्र राशि से दूसरी राशि पर आता है, जो धन, संचय, कुटुम्ब, वाणी और भोजन का स्थान है। इस चरण में जमा पूँजी घटती है, कुटुम्ब में मतभेद उभरते हैं, कहे हुए वचन से सम्बन्ध बिगड़ते हैं और दाँत, मुख अथवा गले के विकार दिखायी देते हैं। परन्तु सबसे बड़ा संकट यहाँ ग्रह का नहीं, प्रमाद का होता है। लोग मान लेते हैं कि मुख्य चरण तो निकल गया, अब क्या शेष है, और इसी असावधानी में हस्ताक्षर कर देते हैं, किसी की जमानत ले लेते हैं, अथवा जल्दबाजी में साझेदारी में उतर जाते हैं। स्मरण रखिये, तीसरा चरण परीक्षा का नहीं, परिणाम का चरण है। पिछले पाँच वर्षों में जो बोया गया, गिना उसी में जाता है।
एक ही साढ़ेसाती किसी को गिराती और किसी को उठाती क्यों है?
चार बातें इसका निर्णय करती हैं। पहली, लग्न से शनि किस भाव में गोचर कर रहा है। यदि चन्द्रमा से बारहवीं पड़ने वाली वही राशि लग्न से एकादश हो रही है, तो व्यय का चरण भी आय देकर जायेगा। दूसरी, जन्मकुण्डली में शनि की अपनी भूमिका। वृष अथवा तुला लग्न वालों के लिये शनि योगकारक है, और ऐसे जातकों की साढ़ेसाती प्रायः तोड़ती नहीं, गढ़ती है। तीसरी, उस समय चल रही महादशा और अन्तर्दशा, क्योंकि गोचर दशा का सेवक है, स्वामी नहीं। शुभ महादशा में साढ़ेसाती केवल विलम्ब देती है, और अशुभ महादशा में वही साढ़ेसाती भारी पड़ जाती है। और चौथी, चन्द्रमा का अपना बल, जिसकी चर्चा ऊपर हो चुकी है। इन चारों को मिलाये बिना किसी पञ्चांग अथवा सामान्य लेख से यह निर्णय नहीं हो सकता कि आपकी साढ़ेसाती आपके लिये क्या लेकर आयी है।
उपाय, जो वास्तव में काम करते हैं
शनि का उपाय संयम और सेवा है, प्रदर्शन नहीं। शनि समय का ग्रह है, अतः सबसे प्रभावी उपाय यही है कि आप समय का अपमान न करें, दिये हुए वचन का पालन करें और अपने अधीन काम करने वाले व्यक्ति के साथ न्याय करें। इसके अतिरिक्त हनुमान जी की उपासना, शनिवार को तेल तथा काले तिल का दान, वृद्धों, श्रमिकों और असहायों की सेवा, और प्रतिदिन एक निश्चित समय पर उठने का अनुशासन, ये सब शनि के काल में मन को स्थिर रखते हैं। इस काल में किया गया कोई भी संयम व्यर्थ नहीं जाता।
यहाँ एक चेतावनी अत्यन्त आवश्यक है। साढ़ेसाती चल रही है, केवल इस कारण से नीलम अथवा कोई भी रत्न कदापि धारण नहीं करना चाहिये। नीलम शीघ्र फल देने वाला रत्न है, और उतनी ही शीघ्रता से विपरीत फल भी दे देता है। किसी मित्र के कहने पर, किसी दुकान की सलाह पर, अथवा किसी सामान्य लेख को पढ़कर रत्न धारण करना उपाय नहीं, नया संकट मोल लेना है। रत्न तभी धारण कीजिये जब लग्न, ग्रह की कारकत्व-स्थिति, चल रही दशा और चन्द्रमा का बल, इन चारों का पूर्ण विचार करके किसी योग्य ज्योतिषी ने आपकी अपनी कुण्डली देखकर निर्णय दिया हो। बिना पूर्ण कुण्डली विश्लेषण के पहना गया रत्न स्वयं ही समस्या बन जाता है।
यदि आप इस समय साढ़ेसाती से गुजर रहे हैं और यह जानना चाहते हैं कि आपके लिये कौन सा चरण भारी है, कौन सा सहायक, और आपकी दशा उसे किस दिशा में मोड़ रही है, तो अपनी जन्म तिथि, समय और स्थान के साथ व्हाट्सऐप पर सन्देश भेजिये अथवा narmdeshwarshastri.com पर सम्पर्क कीजिये। कुण्डली देखकर बताया गया एक स्पष्ट निर्देश, सौ अनुमानों से अधिक मूल्यवान होता है।
- पं. नर्मदेश्वर शास्त्री, प्राच्य विद्या उत्थान न्यास, काशी (वाराणसी)