सीधा उत्तर पहले: छत्तीस गुणों का मिलान वस्तुतः केवल चन्द्रमा की परीक्षा है, सम्पूर्ण कुण्डली की नहीं। अष्टकूट के आठों कूट वर और वधू के जन्म-नक्षत्र तथा चन्द्र राशि से ही बनते हैं, अर्थात् नौ ग्रहों में से केवल एक ग्रह कसौटी पर चढ़ता है। शेष आठ ग्रह, बारहों भाव, लग्न, सप्तमेश, नवांश और दशा-क्रम बिना जाँचे रह जाते हैं। यही कारण है कि छत्तीस में से छत्तीस गुण मिलने पर भी गृहस्थी बिखर सकती है और केवल अठारह गुणों पर भी जीवन भर निभ सकती है। मिलान का वास्तविक बल गुणों की गिनती में नहीं, ग्रह-मैत्री और दोष-विचार में निहित है।
गुण मिलान वास्तव में किसकी परीक्षा लेता है?
जब कोई सज्जन दो पत्रियाँ लेकर आते हैं और प्रसन्न होकर कहते हैं कि गुण अट्ठाईस मिल रहे हैं, तो मेरा पहला प्रश्न यही होता है कि दोनों का लग्न क्या है। प्रायः उत्तर नहीं मिलता, क्योंकि गुण निकालने वाले ने लग्न देखा ही नहीं था। यही इस पूरी पद्धति की सबसे बड़ी विडम्बना है। वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी, इन आठों कूटों का एकमात्र आधार जन्म-नक्षत्र और चन्द्र राशि है। चन्द्रमा मन का कारक है। अतः अष्टकूट मिलान इतना ही बताता है कि दो व्यक्तियों के मन की प्रकृति परस्पर अनुकूल है अथवा नहीं। मन का मेल आवश्यक है, इसमें सन्देह नहीं, किन्तु गृहस्थी केवल मन से नहीं चलती। उसमें आयु चाहिये, सन्तति चाहिये, धन चाहिये, आरोग्य चाहिये, कुटुम्ब का सुख चाहिये। इनमें से एक भी विषय चन्द्रमा के अकेले अधिकार में नहीं है।
अष्टकूट के आठ कूट क्या नापते हैं और क्या छूट जाता है?
आठों कूटों को ध्यान से देखिये तो उनका प्रयोजन स्पष्ट हो जाता है। वर्ण से स्वभाव की उच्चता का बोध होता है, वश्य से परस्पर आकर्षण और वशवर्तिता का, तारा से आयु तथा शुभाशुभ का, योनि से देह-प्रकृति और दाम्पत्य सुख का, गण से मानसिक वृत्ति का, भकूट से पारिवारिक समृद्धि का और नाड़ी से सन्तान तथा आरोग्य का। यह सब उपयोगी है, परन्तु ये सभी संकेत हैं, निर्णय नहीं। इनमें कहीं यह नहीं देखा जाता कि वर की कुण्डली का सप्तम भाव किस अवस्था में है, वधू के सप्तमेश पर किसकी दृष्टि है, दोनों के शुक्र और मंगल किस भाव में बैठे हैं, अथवा विवाह के बाद के दस वर्षों में किसकी कौन सी दशा चलेगी। जिस विषय की परीक्षा ही न हुई हो, उसमें उत्तीर्ण होने का प्रमाणपत्र गुणों की संख्या कैसे दे सकती है।
ग्रह-मैत्री का सही अर्थ क्या है?
यहाँ एक भ्रम मिटाना आवश्यक है। अष्टकूट में जो ग्रह मैत्री नामक कूट है, वह केवल दोनों की चन्द्र राशियों के स्वामियों की मित्रता देखता है और पाँच गुण देता है। वास्तविक ग्रह-मैत्री इससे कहीं आगे की वस्तु है। उसमें देखा जाता है कि वर के लग्नेश और वधू के लग्नेश परस्पर मित्र हैं अथवा शत्रु, क्योंकि लग्नेश देह और व्यक्तित्व का स्वामी है। फिर देखा जाता है कि वर का सप्तमेश वधू की कुण्डली में किस भाव में जाकर पड़ता है और वधू का सप्तमेश वर की कुण्डली में कहाँ। यदि एक का सप्तमेश दूसरे के षष्ठ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में जा गिरे, तो गुण चाहे तीस मिलें, कलह की सम्भावना बनी रहेगी। इसी प्रकार वर के शुक्र और वधू के मंगल की परस्पर स्थिति, दोनों के गुरु की स्थिति और दोनों के चन्द्रमा की भावगत दूरी भी देखी जाती है। यह विचार गिनती में नहीं आता, इसलिये लोकप्रिय नहीं है, परन्तु यही निर्णायक है।
नाड़ी, भकूट और मांगलिक दोष कब भंग हो जाते हैं?
अधिकांश विवाह इन्हीं तीन शब्दों के भय से रुकते हैं, और अधिकांश बार बिना कारण रुकते हैं। शास्त्र ने दोष कहे हैं, तो उनके भंग होने के नियम भी उतने ही स्पष्ट कहे हैं। नाड़ी दोष तब निर्बल हो जाता है जब वर और वधू की जन्म राशि एक हो किन्तु नक्षत्र भिन्न हों, अथवा नक्षत्र एक हो किन्तु चरण भिन्न हों। भकूट दोष तब भंग माना जाता है जब दोनों की राशियों के स्वामी परस्पर मित्र हों अथवा एक ही ग्रह दोनों राशियों का स्वामी हो। मांगलिक दोष के तो अनेक भंग हैं, जिन पर मैंने पृथक् विस्तार से लिखा है। सार यह है कि दोष का उच्चारण जितना सरल है, दोष का निर्णय उतना ही सूक्ष्म। जो व्यक्ति दोष बताये किन्तु उसके भंग की परीक्षा न करे, वह आधा शास्त्र पढ़कर पूरा भय बाँट रहा है।
सप्तम भाव और नवांश से मिलान कैसे होता है?
मैं जब कोई मिलान करता हूँ तो गुणों की तालिका सबसे अन्त में बनाता हूँ। आरम्भ सप्तम भाव से होता है। वर की कुण्डली में सप्तम भाव में कौन बैठा है, सप्तमेश किस भाव में गया, उस पर शुभ की दृष्टि है या पाप की, और वही तीन प्रश्न वधू की कुण्डली में। इसके पश्चात् नवांश कुण्डली खोली जाती है, क्योंकि दाम्पत्य का वास्तविक चित्र वहीं दिखता है। जन्मकुण्डली में जो ग्रह बलवान दिखता है, वह नवांश में निर्बल हो सकता है, और नवांश का सप्तम भाव प्रायः वह बता देता है जो जन्मकुण्डली छिपा लेती है। यदि दोनों के नवांश लग्न परस्पर अनुकूल हों और सप्तमेश नवांश में भी बलवान हो, तो गुण कम होने पर भी विवाह सुखद रहता है। यह क्रम उलट देने से ही अधिकांश भूलें होती हैं।
दशा-साम्य क्यों देखना चाहिये?
एक विषय ऐसा है जिसकी चर्चा प्रायः कोई नहीं करता, और वही सबसे व्यावहारिक है। विवाह के पश्चात् के आठ से दस वर्ष गृहस्थी की नींव रखते हैं। उन्हीं वर्षों में सन्तान, आजीविका, गृह-निर्माण और कुटुम्ब का विस्तार होता है। अब यदि उन्हीं वर्षों में वर की अष्टमेश की दशा चल रही हो और वधू की भी व्ययेश की अन्तर्दशा हो, तो दोनों एक साथ संघर्ष में रहेंगे और एक-दूसरे को सँभालने वाला कोई न बचेगा। इसके विपरीत यदि एक की दशा कष्टप्रद हो और दूसरे की शुभ, तो कुटुम्ब सन्तुलित रहता है, क्योंकि एक का बल दूसरे की कमी को ढँक लेता है। इसे मैं दशा-साम्य कहता हूँ। छत्तीस गुण इस प्रश्न पर पूर्णतः मौन हैं, जबकि जीवन इसी प्रश्न पर टिका होता है।
उपाय और एक आवश्यक सावधानी
जहाँ मिलान में न्यूनता दिखे, वहाँ शास्त्र ने निषेध नहीं, परिहार बताया है। सप्तमेश निर्बल हो तो उस ग्रह से सम्बन्धित व्रत, गुरुवार का उपवास, विवाह से पूर्व गौरी-शंकर का पूजन, और दोष विशेष के लिये शास्त्रोक्त शान्ति कर्म कहे गये हैं। परन्तु यहाँ एक बात अत्यन्त आग्रह से कहनी है। रत्न कभी भी बिना पूर्ण कुण्डली विश्लेषण के धारण नहीं करना चाहिये। किसी ने कह दिया कि विवाह नहीं हो रहा तो मूँगा पहन लो, और वह मंगल यदि आपकी कुण्डली में मारकेश अथवा बाधकेश हुआ, तो लाभ के स्थान पर हानि होगी। रत्न ग्रह को बल देता है, और निर्बल अशुभ ग्रह को बल देना अपने ही हाथों संकट को बल देना है। रत्न वही धारण कराइये जो लग्न, ग्रह की भावगत स्थिति और चलती हुई दशा तीनों देखकर निश्चित किया गया हो।
यदि आप अपने पुत्र अथवा पुत्री के विवाह-सम्बन्ध पर विचार कर रहे हैं और चाहते हैं कि निर्णय केवल गुणों की संख्या से नहीं, अपितु ग्रह-मैत्री, सप्तम भाव, नवांश और दशा-साम्य के पूर्ण शास्त्रीय विचार से हो, तो मुझसे परामर्श कीजिये। व्हाट्सएप पर सन्देश भेजिये अथवा अन्य लेख यहाँ पढ़िये। दोनों पत्रियाँ जन्म समय तथा जन्म स्थान सहित भेजिये।
- पं. नर्मदेश्वर शास्त्री, प्राच्य विद्या उत्थान न्यास, काशी (वाराणसी)