पं. नर्मदेश्वर शास्त्री

कुण्डली में सन्तान योग कैसे देखें? पंचम भाव से क्या-क्या जाना जाता है?

कुण्डली में सन्तान योग मुख्यतः पंचम भाव, पंचम भाव के स्वामी, सन्तान के कारक ग्रह गुरु और सप्तांश वर्ग-कुण्डली को एक साथ देखकर जाना जाता है। केवल पंचम भाव खाली या पीड़ित दिख जाने से सन्तान में बाधा का निर्णय नहीं होता। चारों का सम्मिलित बल देखा जाता है, और उसके साथ वर्तमान दशा तथा गोचर का मेल भी। जिसे लोग एक दोष समझकर घबराते हैं, वह प्रायः केवल एक संकेत होता है, पूरा फैसला नहीं।

पंचम भाव: केवल सन्तान का नहीं, सुख के बीज का भाव

अधिकतर लोग पंचम भाव को सन्तान का घर कहकर छोड़ देते हैं, पर इसका विस्तार कहीं बड़ा है। यह बुद्धि, पूर्वजन्म के संचित पुण्य, मन्त्र-संस्कार और सृजन की शक्ति का भाव भी है। शास्त्र का मूल विचार यह है कि सन्तान भी एक प्रकार की सृष्टि है, जो पुण्य और संस्कार के बीज से उगती है। इसीलिए पंचम भाव का बल देखते समय केवल यह नहीं पूछा जाता कि सन्तान होगी या नहीं, बल्कि यह भी देखा जाता है कि सन्तान का स्वभाव कैसा होगा और माता-पिता के साथ उसका सम्बन्ध कैसा रहेगा।

पंचमेश की स्थिति क्या बताती है?

पंचम भाव का स्वामी जिस भाव में बैठता है, उससे सन्तान-सुख की दिशा खुलती है। पंचमेश यदि केन्द्र या त्रिकोण में शुभ दृष्टि के साथ हो, अपनी राशि, उच्च राशि या मित्र राशि में हो, तो परम्परागत मत से सन्तान का मार्ग सहज माना जाता है। इसके विपरीत पंचमेश छठे, आठवें या बारहवें भाव में चला जाए, नीच राशि में हो या सूर्य के अति निकट आकर अस्त हो जाए, तो सन्तान के विषय में विलम्ब, परिश्रम या अतिरिक्त प्रयास की सम्भावना बताई जाती है। यहाँ ध्यान रखने की बात यह है कि छठे, आठवें, बारहवें में जाना अकेला अशुभ संकेत है, उसे तब तक अन्तिम नहीं माना जाता जब तक उसे पुष्ट करने वाले दूसरे योग न मिलें।

गुरु क्यों है सन्तान का कारक?

ज्योतिष में गुरु को पुत्र और सन्तान का मुख्य कारक कहा गया है। जैसे भाव का स्वामी देखा जाता है, वैसे ही कारक ग्रह की अवस्था भी देखी जाती है। यदि गुरु बलवान हो, शुभ भाव में हो और राहु, शनि या मंगल जैसे ग्रहों की कठोर पीड़ा से मुक्त हो, तो सन्तान के पक्ष में एक मजबूत सहारा माना जाता है। एक सूक्ष्म बात यह भी प्रचलित है कि कारक ग्रह स्वयं अपने कारकत्व वाले भाव में बैठे तो कभी-कभी उस भाव के फल में कमी करता है। इसे परम्परा का एक मत मानकर देखना चाहिए, कोई अटल नियम नहीं। हर कुण्डली में गुरु के साथ बाकी सम्बन्ध मिलाकर ही निष्कर्ष निकलता है।

पंचम भाव को पीड़ित करने वाले योग कौन-से माने जाते हैं?

परम्परागत ग्रन्थों में पंचम भाव या पंचमेश पर शनि, राहु, केतु और मंगल का प्रभाव सन्तान सम्बन्धी बाधा के रूप में गिनाया जाता है। शनि विलम्ब देता है, राहु भ्रम और अनिश्चितता लाता है, केतु वैराग्य या कमी का संकेत देता है, और मंगल तीव्रता तथा कभी-कभी अचानक होने वाली रुकावट। पर यहाँ भी एक सन्तुलन चाहिए। पंचम में शनि का होना सदा सन्तान न होने का संकेत नहीं है। बहुत बार इसका अर्थ केवल इतना होता है कि सन्तान देर से आती है, और वह अधिक गम्भीर तथा परिपक्व स्वभाव की होती है। ऐसे दम्पतियों की कमी नहीं जिन्हें देर से सन्तान-सुख मिला, और जिनकी कुण्डली में पंचम का विलम्ब पहले से स्पष्ट था।

सप्तांश कुण्डली: जो मुख्य कुण्डली में छूट जाता है

सन्तान के विचार में सप्तांश वर्ग-कुण्डली का विशेष स्थान है। जन्म-कुण्डली एक बड़ा नक्शा है, तो सप्तांश उसी नक्शे में सन्तान वाला मोहल्ला है। कई बार मुख्य कुण्डली में पंचम भाव कमजोर दिखता है, पर सप्तांश में पंचमेश और गुरु अच्छी स्थिति में होते हैं, तब निष्कर्ष बदल जाता है। इसी प्रकार मुख्य कुण्डली में सब कुछ अच्छा दिखे और सप्तांश में गुरु पीड़ित हो, तो भी सावधानी आवश्यक है। इसलिए जो ज्योतिषी केवल जन्म-कुण्डली देखकर सन्तान का निर्णय सुना दे, उसकी बात को अधूरा समझना चाहिए। पति और पत्नी दोनों की कुण्डली साथ में देखना भी परम्परा का उचित मार्ग है, क्योंकि सन्तान का सुख दोनों के संयुक्त प्रारब्ध से जुड़ा है।

दशा और गोचर: समय कब खुलता है?

योग होना एक बात है और उसका फल मिलने का समय आना दूसरी बात। पंचमेश, गुरु, या पंचम भाव में स्थित ग्रह की महादशा और अन्तर्दशा सन्तान के प्रसंग को जगाती है। गोचर में जब गुरु पंचम भाव, पंचमेश या लग्न से शुभ स्थान पर आता है, तब परम्परा अनुकूल समय मानती है। इसीलिए दो समान कुण्डलियों में भी एक दम्पती को सन्तान जल्दी मिल सकती है और दूसरे को कुछ वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती है। विलम्ब से हताश होने की जगह दशा का क्रम समझना अधिक उपयोगी है।

सावधानी और सही दृष्टि

ज्योतिष मार्गदर्शन का शास्त्र है, चिकित्सा का विकल्प नहीं। सन्तान में कठिनाई हो तो पहले योग्य चिकित्सक से जाँच और उपचार अवश्य कराएँ, और ज्योतिषीय उपाय को केवल सहायक मानें। रत्न कभी भी पूरी कुण्डली का विश्लेषण किए बिना धारण न करें। गलत ग्रह का रत्न लाभ की जगह हानि कर सकता है, इसलिए पंचम भाव के दोष के नाम पर किसी के कहने भर से पुखराज या कोई और रत्न न पहनें। जिन उपायों को सरल और सुरक्षित माना जाता है, जैसे गुरुवार का व्रत, बड़ों और गुरुजनों की सेवा, तथा सन्तान गोपाल मन्त्र का श्रद्धापूर्वक जप, उन्हें भी अपनी कुण्डली के अनुसार ही चुनना ठीक रहता है।

यदि आप अपनी या अपने परिवार की कुण्डली में सन्तान योग, पंचम भाव और सप्तांश का विश्लेषण कराना चाहते हैं, तो शास्त्री जी से सीधे बात कर सकते हैं। परामर्श के लिए यहाँ व्हाट्सऐप पर सन्देश भेजें, और अधिक लेख पढ़ने के लिए narmdeshwarshastri.com पर पधारें।

- पं. नर्मदेश्वर शास्त्री, प्राच्य विद्या उत्थान न्यास, काशी (वाराणसी)

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