सीधा उत्तर पहले: मंगल दोष तब लगता है जब जन्मकुण्डली में मंगल लग्न से प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में स्थित हो, और यही गणना चन्द्रमा तथा शुक्र से भी की जाती है। परन्तु यही दोष अनेक स्थितियों में भंग भी हो जाता है — मंगल जब अपनी राशि में हो, उच्च का हो, गुरु से दृष्ट हो, अथवा दोनों कुण्डलियों में समान दोष हो, तब मांगलिक दोष निष्फल माना जाता है। अब एक ऐसी बात जो आपसे कोई नहीं कहता — मेरे पास आने वाली प्रत्येक सौ कुण्डलियों में से लगभग चालीस में यह दोष निकलता है। विचार कीजिये, यदि चालीस प्रतिशत मनुष्य वैवाहिक विनाश के लिये ही जन्मे होते, तो गृहस्थी नाम की संस्था अब तक समाप्त हो चुकी होती। अतः मंगल दोष का सत्य भय में नहीं, गणना में छिपा है — और वही गणना आज मैं आपके सामने खोलकर रखता हूँ।
मंगल दोष की सही गणना — केवल लग्न से देखना आधा सत्य है
अधिकांश लोग पत्रिका में केवल लग्न से मंगल की स्थिति देखकर मांगलिक होने की घोषणा कर देते हैं। शास्त्र की विधि इससे कहीं सूक्ष्म है। मंगल की स्थिति तीन स्थानों से देखी जाती है — लग्न से, चन्द्रमा से और शुक्र से। लग्न शरीर है, चन्द्रमा मन है और शुक्र दाम्पत्य-सुख का कारक है। जब तीनों से मंगल उन्हीं पाँच भावों में पड़े, तभी दोष प्रबल कहा जाता है। केवल एक स्थान से बना दोष सामान्य कोटि का होता है, जिसका प्रभाव अल्प रहता है। दक्षिण भारत की परम्परा में द्वितीय भाव का मंगल भी गिना जाता है, अतः वहाँ की बनी पत्रिका और उत्तर भारत की पत्रिका में अन्तर आ सकता है। यही कारण है कि एक ही व्यक्ति को कोई मांगलिक बताता है और कोई नहीं — दोनों झूठे नहीं हैं, दोनों की गणना-पद्धति भिन्न है।
शास्त्र ने यह विचार क्यों दिया — भय के लिये नहीं, मेल के लिये
मंगल अग्नि तत्त्व का ग्रह है — ऊर्जा, पराक्रम, साहस और तीव्रता का कारक। जब यही अग्नि विवाह से जुड़े भावों — सप्तम, अष्टम, चतुर्थ, द्वादश — में बैठती है, तो स्वभाव में तीखापन, वाणी में उग्रता और सम्बन्धों में अधैर्य की सम्भावना बनती है। शास्त्रकारों ने यह विचार इसलिये दिया कि विवाह से पूर्व दो स्वभावों का मेल परखा जा सके — जैसे वैद्य दो औषधियों का योग देखता है। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में यह नहीं लिखा कि मांगलिक व्यक्ति का विवाह होगा ही नहीं अथवा जीवनसाथी का नाश ही होगा। यह भय बाद के काल की देन है, शास्त्र की नहीं। शास्त्र का वचन सन्तुलन सिखाता है, आतंक नहीं।
मंगल दोष भंग होने की प्रमुख शास्त्रीय स्थितियाँ
अब वह भाग जो सबसे कम बताया जाता है। मुहूर्त और संहिता ग्रन्थों में दोष-भंग के अनेक योग स्पष्ट लिखे हैं। मंगल यदि अपनी राशि मेष अथवा वृश्चिक में हो, उच्च राशि मकर में हो, अथवा मूल त्रिकोण में हो, तो दोष क्षीण हो जाता है। मंगल पर गुरु की दृष्टि हो अथवा गुरु के साथ युति हो, तो गुरु की शुभता मंगल की उग्रता को शान्त कर देती है। कर्क और सिंह लग्न की कुण्डली में मंगल योगकारक होकर केन्द्र-त्रिकोण का स्वामी बनता है — वहाँ वही मंगल दोष नहीं, वरदान बन जाता है। सप्तम भाव में मंगल यदि शुभ ग्रहों के बीच में हो अथवा बलवान शुक्र से दृष्ट हो, तो भी उसका तीखापन घट जाता है। अर्थात् भाव-स्थिति देखकर रुक जाना अधूरी विद्या है — राशि, दृष्टि, युति और स्वामित्व देखे बिना मांगलिक कहना वैसा ही है जैसे ज्वर देखे बिना औषधि लिख देना।
दोनों कुण्डलियों का मिलान — काँटे से काँटा निकलता है
विवाह-विचार में सबसे व्यावहारिक नियम यही है: यदि वर और कन्या दोनों की कुण्डली में समान बल का मंगल दोष हो, तो दोष परस्पर कट जाता है। जैसे दो समान वेग की धाराएँ मिलकर एक स्थिर प्रवाह बना लेती हैं, वैसे ही दो मांगलिक स्वभाव एक-दूसरे की तीव्रता को समझते और सह लेते हैं। इतना ही नहीं — एक की कुण्डली में मंगल जिन भावों में हो, दूसरे की कुण्डली में उन्हीं भावों में शनि, राहु अथवा सूर्य जैसा क्रूर ग्रह बैठा हो, तो भी दोष का प्रतिकार माना गया है। मेरे अनुभव में अनेक ऐसे दम्पती हैं जिनमें दोनों मांगलिक थे और गृहस्थी अत्यन्त सुखद चली, क्योंकि दोनों की ऊर्जा का स्तर समान था। कठिनाई प्रायः वहाँ आती है जहाँ एक पक्ष अति उग्र और दूसरा अति कोमल हो — और यही देखना मिलान का वास्तविक प्रयोजन है।
क्या अट्ठाईस वर्ष के बाद मंगल दोष स्वयं समाप्त हो जाता है?
लोक में प्रचलित है कि अट्ठाईस वर्ष की आयु के बाद मंगल दोष नहीं लगता। इसका आधार यह है कि प्रत्येक ग्रह की एक परिपक्वता-आयु होती है और मंगल अट्ठाईस वर्ष में परिपक्व होता है। परिपक्व होने का अर्थ है कि उसकी उग्रता व्यक्ति के स्वभाव में पचकर संयत हो जाती है — युवावस्था का जो आवेग पहले सम्बन्ध तोड़ सकता था, वह अब धैर्य में ढल चुका होता है। परन्तु यह कहना कि दोष पूर्णतः मिट जाता है, अतिशयोक्ति है। कुण्डली का ग्रह अपने स्थान से हटता नहीं; उसका फल आयु, दशा और साधना के अनुसार घटता-बढ़ता है। अतः अट्ठाईस के बाद विवाह करने पर दोष का भय अवश्य घट जाता है, परन्तु मिलान की सावधानी तब भी उतनी ही आवश्यक रहती है।
उपाय, सावधानी और मूँगा रत्न का सच
मंगल की शान्ति के लिये शास्त्रों में सरल और सात्त्विक मार्ग बताये गये हैं — मंगलवार का व्रत, हनुमान जी की उपासना, सुन्दरकाण्ड का पाठ, तथा मसूर, गुड़, ताँबा और लाल वस्त्र का दान। जहाँ दोष प्रबल हो वहाँ कुम्भ विवाह अथवा विष्णु विवाह जैसे विधान भी परम्परा में हैं, जो योग्य आचार्य की देख-रेख में ही होने चाहिये। परन्तु एक चेतावनी अत्यन्त आवश्यक है — मंगल का रत्न मूँगा बिना पूर्ण कुण्डली-विश्लेषण के कभी धारण मत कीजिये। रत्न ग्रह को शान्त नहीं करता, उसे बल देता है। यदि आपकी कुण्डली में मंगल छठे अथवा आठवें भाव का स्वामी होकर अशुभ फल दे रहा हो, तो मूँगा पहनना उस अग्नि में घी डालने के समान होगा — क्रोध, दुर्घटना और कलह बढ़ सकते हैं। रत्न औषधि है, और औषधि बिना परीक्षण के लेना रोग से अधिक घातक होता है।
अपनी कुण्डली दिखाकर ही निर्णय लीजिये
मंगल दोष न तो कोरा भ्रम है और न ही जीवन का दण्ड — वह एक गणना है, जिसका उत्तर आपकी अपनी कुण्डली में लिखा है। यदि आपके अथवा आपकी सन्तान के विवाह में मंगल दोष की बात कहकर भय दिखाया गया है, तो निर्णय से पूर्व पूरी कुण्डली का परीक्षण अवश्य करा लीजिये। परामर्श के लिये आप मुझसे व्हाट्सऐप पर सन्देश भेजकर सीधे जुड़ सकते हैं, तथा अन्य लेखों और सेवाओं के लिये narmdeshwarshastri.com पर पधारिये।
— पं. नर्मदेश्वर शास्त्री, प्राच्य विद्या उत्थान न्यास, काशी (वाराणसी)